नवरात्रि (दुर्गा पू...
 
Notifications
Clear all

[Sticky] नवरात्रि (दुर्गा पूजन)

6 Posts
1 Users
0 Likes
162 Views
Forum 1
(@surajboss)
Posts: 64
Trusted Member Admin
Topic starter
 

आइये सभी मिलजुल कर नवरात्रि को मनाते है ।  ये त्यौहार सोमवार 19 मार्च से शुरु हो रहा है ।   

यह चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा से लेकर रामनवमी तक मनाया जाता है ।  इन दिनों भगवती दुर्गा पूजा तथा कन्या पूजन का विधान है ।

प्रतिपदा के दिन घट-स्थापना एवं जौ बोने की क्रिया की जाती है ।  नौ दिन तक ब्राहमण द्घारा या स्वयं देवी भगवती दुर्गा का पाठ कराने का विधान है ।

कथा ः प्राचीन समय में सुरथ नाम के राजा थे ।  राजा प्रजा की रक्षा में उदासीन रहने लगे थे ।  परिणामस्वुप पड़ोसी राजा ने उस पर चढ़ाई कर दी ।  सुरथ की सेना भी शत्रु से मिल गई थी ।  परिणामस्वरुप राजा सुरथ की हार हुई और वह जान बचाकर जंगल की तरफ भाग गया ।

उसी वन में समाधि नामक एक वणिक अपनी स्त्री एवं संतान के दुर्व्यवहार के कारण निवास करता था ।  उसी वन में वणिक समाधि और राजा सुरथ की भेंट हुई ।  दोनों में परस्पर परिचय हुआ ।  वे दोनों घूमते हुए महर्ष मेघा के आश्रम में पहुँचे ।  महर्ष मेघा ने उन दोनों के आने का कारण जानना चाहा तो वे दोनों बोले कि हम अपने ही सगे-सम्बन्धियों द्घारा अपमानित एवं तिरस्कृत होने पर भी हमारे हृदय में उनका मोह बना हुआ है, इसका क्या कारण है ।

महर्षि मेघा ने उन्हें समझाया कि मन शक्ति के आधीन होता है और आदि शक्ति के विघा और अविघा दो रुप है ।  विघा ज्ञान-स्वरुप है और अविघा अज्ञान स्वरुपा ।  जो व्यक्ति अविघा (अज्ञान) के आदिकरण रुप में उपासना करते है, उन्हें वे विघा स्वरुपा प्राप्त होकर मोक्ष प्रदान करती है ।

इतना सुन राजा सुरथ ने प्रश्न किया – हे महर्षि ।  देवी कौन है ।  उनका जन्म कैसे हुआ ।  महर्ष बोले – आप जिस देवी के विषय में पूछ रहे है वह नित्य स्वरुपा और विश्व व्यापिनी है ।  उसके बारे में ध्यानपूर्वक सुनो ।  कल्पांत के समय विष्णु भगवान क्षीर सागर में अनन्त शैय्या पर शयन कर रहे थे, तब उनके दोनों कानों से मधु और कैटभ नामक दो दैत्य उत्पन्न हुए ।  वे दोनों विष्णु की नाभि कमल से उत्पन्न ब्रहमाजी को मारने दौड़े ।  ब्रहमाजी ने उन दोनों राक्षसों को देखकर विष्णुजी की शरण में जाने की सोची ।  परन्तु विष्णु भगवान उस समय सो रहे थे ।  तब उन्होंने विष्णु भगवान को जगाने हेतु उनके नयनों में निवास करने वाली योगनिद्रा की स्तुति की ।

परिणामस्वरुप तमोगुण अधिष्ठात्री देवी विष्णु भगवान के नेत्र, नासिका, मुख तथा हृदय से निकलकर ब्रहमा के सामने उपस्थित हो गई ।  योगनिद्रा के निकलते ही विष्णु भगवान उठकर बैठ गये ।  भगवान विष्णु और उन राक्षसों में पाँच हजार वर्षों तक युद्घ चलता रहा ।  अन्त में मधु और कैटभ दोनों राक्षस मारे गये ।

ऋषि बोले – अब ब्रहमाजी की स्तुति से उत्पन्न महामाया देवी की वीरता तथा प्रभाव का वर्णन करता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनो ।

एक समय देवताओं के स्वामी इन्द्र और दैत्यों के स्वामी महिषासुर में सैंकड़ो वर्षो तक घनघोर संग्राम हुआ ।  इस युद्घ में देवराज इन्द्र की पराजय हुई और महिषासुर इन्द्रलोक का स्वामी बन बैठा ।

अब देवतागण ब्रहमा के नेतृत्व में भगवान विष्णु और भगवान शंकर की शरण में गये ।

देवताओं की बातें सुनकर भगवान विष्णु तथा भगवान शंकर क्रोधित हो गये ।  भगवान विष्णु के मुख तथा ब्रहमा, शिवजी तथा इन्द्र आदि के शरीर से एक तेज पुंज निकला जिससे समस्त दिशाएँ जलने लगी और अन्त में यही तेज पुंज एक देवी के रुप में परिवर्तित हो गया ।

देवी ने सभी देवताओं से आयुद्घ एवं शक्ति प्राप्त करके उच्च स्वर में अट्टहास किया जिससे तीनों लोकों में हलचल मच गई ।

महिषासुर अपनी सेना लेकर इस सिंहनाद की ओर दौड़ा ।  उसने देखा कि देवी के प्रभाव से तीनों लोक आलोकिक हो रहे है ।

महिषासुर की देवी के सामने एक भी चाल सफल नहीं हुई और वह देवी के हाथों मारा गया ।  आगे चलकर यही देवी शुम्भ और निशुम्भ राक्षसों का वध करने के लिये गौरी देवी के रुप में अवतरित हुई ।

इन उपरोक्त व्याख्यानों को सुनाकर मेघा ऋषि ने राजा सुरथ और वणिक से देवी स्तवन की विधिवत व्याख्या की ।

राजा और वणिक नदी पर जाकर देवी की तपस्या करने लगे ।  तीन वर्ष घोर तपस्या करने के बाद देवी ने प्रकट होकर उन्हें आर्शीवाद दिया ।  इससे वणिक संसार के मोह से मुक्त होकर आत्मचिंतन में लग गया और राजा ने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके आपना वैभव प्राप्त कर लिया ।

 
Posted : 04/05/2022 4:01 am
Forum 1
(@surajboss)
Posts: 64
Trusted Member Admin
Topic starter
 

सांई राम।।।

नवरात्र: शक्ति की उपासना का उत्तम काल

यादेवी सर्वभूतेषू शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

जो देवी संसार के समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उस शक्ति स्वरूपा पराम्बा माता दुर्गा को बारम्बार नमस्कार है।

संसार में जितनी वस्तुएं दिखाई देती हैं। सभी के अधिष्ठात्र देवता बतलाए गए हैं, परंतु अति महत्वपूर्ण है, शक्ति एवं शक्ति का उपयोग। शक्ति के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। यदि यह कहा जाए कि शक्ति का प्रयोग न जानने वाला शक्ति होते हुए भी शक्ति विहीन है। परिणामस्वरूप श्री दुर्गा सप्तशती में मधु कैटभ, चामुण्ड, इत्यादि ऐसे भयंकर असुरों का वर्णन आता है, जिनके पास अथाह शक्ति थी। परंतु उस शक्ति का उपयोग अति निकृष्ट था। श्री दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में दो ऐसे असुरों का वर्णन मिलता है, जिन्होंने भगवान विष्णु से कई वर्ष तक युद्ध किया। भगवान विष्णु ने चिंतन किया कि इन्हें शक्ति प्राप्त है। युद्ध से जीता नहीं जा सकता। महामाया  की प्रेरणा से बुद्धिरूप में स्थित देवी का ध्यान किया और उन दैत्यों से कहा कि हम तुमसे अति प्रसन्न हैं, वर मांगो। दैत्यों ने हंस कर कहा की वर तुम नहीं हम देंगे, क्योंकि हमारे पास शक्ति है। मांगो क्या मांगते हो। भगवान विष्णु ने कहा कि यदि तुम दोनों हमसे प्रसन्न हो तो मुझे यह वर दो कि तुम दोनों मेरे हाथों मारे जाओ। और उन्हें वर देना पड़ा तथा वरदान के बाद उनका बध हो गया। शक्ति का उपयोग शक्तिमान व्यक्ति उचित तरीके से नहीं करता है, तो उसका विनाश शीघ्र हो जाता है। परंतु शक्ति अर्जित कैसे की जाए, यह विचारणीय प्रश्न है। 

वर्ष में चार नवरात्रों का वर्णन मिलता है। दो गुप्त एवं दो प्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष दो नवरात्रों में एक को शारदीय नवरात्र व दूसरे को वासन्तिक नवरात्र कहा जाता है। शारदीय अर्थात शरद ऋतु में पड़ने वाला नवरात्र। नवरात्र में नव शब्द संख्यावाची भी है तथा नवीनता का द्योतक भी। नवदुर्गा: प्रकीर्तिता: के अनुसार माता दुर्गा के नव स्वरूपों का व‌र्णन मिलता है और ये स्वरूप नवीन है, नए-नए हैं। अर्थात् माता दुर्गा के नवों स्वरूपों में उल्लास के साथ रत हो जाना, लग जाना, ध्यानावस्थित हो जाना, नवरात्र की एक परिभाषा हो सकती है।

अब किसी नवीनता को प्राप्त करने के लिए प्राचीनता को बदलना होगा, इस पर विचार करना होगा। इस परिपे्रक्ष्य में पौरोहित्य शास्त्र पहला सूत्र देता है, संकल्प का। संकल्प का अर्थ है सम्यक् तरीके से कल्पना की जाए। आज कल्पना ही सम्यक् नहीं है। सम्यक् शब्द का अभिप्राय उचित है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को शक्ति के अर्जन में प्रथम पीढ़ी के रूप में संकल्प लेना चाहिए।

नवरात्र की पूर्व संध्या में मन में साधक यह संकल्प लेता है कि मुझे शक्ति की उपासना करनी है। उसके बाद बनाई गई योजनाओं को कार्यान्वित करना होगा। मानव मस्तिष्क की यह व्यवस्था है कि योजनाओं को किस प्रकार मूर्तरूप प्रदान किया जाए। शक्ति पूजक को चाहिए कि वह रात्रि में शयन ध्यानपूर्वक करें। प्रात: काल उठकर भगवती का स्मरण कर ही नित्य क्रिया प्रारम्भ करनी चाहिए। नीतिगत कार्यो से जुड़कर अनीतिगत कार्यो को उपेक्षित करनी चाहिए। सत्य का आचरण करना चाहिए। आहार संबंधी पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए। दूसरे के अपकार का चिंतन न करें। नवरात्र में सम्यक् प्रकार से सत्याचरण करते हुए व्यक्ति शक्ति का अर्जन कर सकता है।

अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

ॐ सांई राम।।।

 
Posted : 04/05/2022 4:01 am
Forum 1
(@surajboss)
Posts: 64
Trusted Member Admin
Topic starter
 

Durga in the Hindu tradition

According to the narrative from the Devi Mahatmya of the Markandeya Purana, the form of Durga was created as a warrior goddess to fight a demon. The demon's father Rambha, king of the demons, once fell in love with a water buffalo, and Mahishasur was born out of this union. He is therefore able to change between human and buffalo form at will (mahisha means "buffalo"). Through intense prayers to Brahma, Mahishasura had the boon that he could not be defeated by any man or god. By virtue of this power, he invaded the gods, who went for help to the supreme trinity (Brahma, Vishnu, and Rudra), but Mahishashura defeated all of the gods including the trinity themselves. He unleashed a reign of terror on earth, heaven and the nether worlds.

 
DurgaEventually, since only a woman could kill him, the trinity bestowed a dazzling beam of energy upon the Goddess Trinity, transforming her into the goddess, Durga. Her form was blindingly beautiful with three lotus-like eyes, ten powerful hands, lush blonde hair with beautiful curls, a red-golden glow from her skin and a quarter moon on her forehead. She wore a shiny oceanic blue attire emitting fierce rays. Her ornaments were carved beautifully of gold, with ocean pearls and precious stones embedded in it. Her face was sculpted by Shiva, torso by Indra, breasts by Chandra (the moon), teeth by Brahma, bottom by the Earth, thighs and knees by Varuna (water), and her three eyes by Agni (fire). Each god also gave her their own most powerful weapons, Rudra's trident, Vishnu's discus, Indra's thunderbolt, Brahma's kamandal, Kuber's gada, etc. Himalayas gifted her a fierce whitish golden lion. On the end of the 8th and beginning of the 9th day of waxing moon, Chanda and Munda came to fight the goddess. She turned blue with anger and goddess Chamunda leaped out of her third eye. Her form was the most powerful one with 3 red eyes, blood-filled tongue and dark skin; who finally killed the twin demons with her sword. This form of the divine goddess is worshipped during the sandhikshan of Durga Puja festival, as sandhi/chandi puja. Finally on the tenth day of waxing moon, goddess Durga killed Mahishasura with her trident.

The word Shakti, meaning strength, reflects the warrior aspect of the goddess, embodying a traditional male role. She is also strikingly beautiful, and initially Mahishasura tries to marry her. Other incarnations include Annapurna and Karunamayi (karuna = kindness).

 The Worship of Durga

The 4 day Durga Puja is the biggest annual festival in Bengal and other parts of Eastern India, but it is celebrated in various forms throughout the Hindu universe.

The day of Durga's victory is celebrated as Vijaya Dashami (East and South India), Dashain (Nepal) or Dussehra (North India) - these words literally mean "the tenth" (day), vijaya means "of-victory". In Kashmir she is worshipped as shaarika (the main temple is in Hari Parbat in Srinagar).

The actual period of the worship however may be on the preceding nine days followed by the last day called Vijayadashami in North India or five days in Bengal, (from the sixth to tenth day of the waxing-moon fortnight). Nine aspects of Durga known as Navadurga are meditated upon, one by one during the nine-day festival by devout shakti worshippers.

In North India, this tenth day, signifying Rama's victory in his battle against the demon Ravana, is celebrated as Dussehra - gigantic straw effigies of Ravana are burnt in designated open spaces (e.g. Delhi's Ram Lila grounds), watched by thousands of families and little children.

In Gujarat it is celebrated as the last day of Navaratri, during which the Garba dance is performed to celebrate the vigorous victory of Mahishasura-mardini Durga.

The Goddess Durga worshipped in her peaceful form as Shree Shantadurga also known as santeri , is the patron Goddess of Goa. She is worshipped by all Goan Hindus irrespective of caste and even by some Christians in Goa.

Goddess Durga is worshipped in many temples of Dakshina Kannada district of Karnataka.

 
Posted : 04/05/2022 4:02 am
Forum 1
(@surajboss)
Posts: 64
Trusted Member Admin
Topic starter
 
Navratri

 
Dandiya, the most awaited traditional dance festival of India.

Navratri, the festival of nights, lasts for 9 days with three days each devoted to worship of Ma Durga, the Goddess of Valor, Ma Lakshmi, the Goddess of Wealth and Ma Saraswati, the Goddess of Knowledge. During the nine days of Navratri, feasting and fasting take precedence over all normal daily activities amongst the Hindus. Evenings give rise to the religious dances in order to worhip Goddess Durga Maa.

1st - 3rd day of Navratri

On the first day of the Navaratras, a small bed of mud is prepared in the puja room of the house and barley seeds are sown on it. On the tenth day, the shoots are about 3 - 5 inches in length. After the puja, these seedlings are pulled out and given to devotees as a blessing from god. These initial days are dedicated to Durga Maa, the Goddess of power and energy. Her various manifestations, Kumari, Parvati and Kali are all worshipped during these days. They represent the three different classes of womanhood that include the child, the young girl and the mature woman.

4th - 6th day of Navratri

During these days, Lakshmi Maa, the Goddess of peace and prosperity is worshipped. On the fifth day which is known as Lalita Panchami, it is traditional, to gather and display all literature available in the house, light a lamp or 'diya' to invoke Saraswati Maa, the Goddess of knowledge and art.

7th - 8th day of Navratri

These final days belong to Saraswati Maa who is worshipped to acquire the spiritual knowledge. This in turn will free us from all earthly bondage. But on the 8th day of this colourful festival, yagna (holy fire) is performed. Ghee (clarified butter), kheer (rice pudding) and sesame seeds form the holy offering to Goddess Durga Maa.

Mahanavami

The festival of Navratri culminates in Mahanavami. On this day Kanya Puja is performed. Nine young girls representing the nine forms of Goddess Durga are worshiped. Their feet are washed as a mark of respect for the Goddess and then they are offered new clothes as gifts by the worshiper. This ritual is performed in most parts of the country.

 
 
Posted : 04/05/2022 4:02 am
Forum 1
(@surajboss)
Posts: 64
Trusted Member Admin
Topic starter
 

जय सांई राम।।।

नवरात्रि साधना एक संकल्पित साधना है
 
नवरात्र विशेष प्रकार की साधना का समय है। यह वर्ष में दो बार आता है। एक चैत्र माह में, दूसरा आश्विन माह में। हमारे धर्म ग्रंथों में इसे विशेष महत्व दिया गया है और ऋषि-मुनियों ने इसे सामूहिक उपासना का समय बताया है।

विशेष साधना का क्या मतलब? मतलब यह है कि इस अवधि में साधना करने का निश्चय आप स्वयं करते हैं। वह साधना किस प्रकार करेंगे, यह भी आप ही तय करते हैं। आप पर कोई बंधन नहीं है। इसीलिए नवरात्रों में कई तरह की उपासनाएं प्रचलित हैं। राम भक्त इन दिनों में रामायण पाठ या राम के चरित्र का विशेष अध्ययन करते हैं, कृष्ण भक्त गीता आदि का परायण करते हैं। देवी उपासक इन दिनों भगवती दुर्गा के लिए व्रत-उपवास रखते हैं। कुछ लोग तांत्रिक साधनाएँ करते हैं। नवरात्रों में गायत्री मंत्रों के जप की भी परंपरा है। ऐसी ही कई और तरह की साधनाएं प्रचलित हैं।

नवरात्रों का समय दो ऋतुओं के मिलन का समय है- सर्दी और गर्मी के मौसम का मिलन। इस ऋतु परिवर्तन के समय सूक्ष्म जगत में अनेक प्रकार की हलचलें होती हैं। शरीर से लेकर पूरे चेतन जगत में ज्वार-भाटा जैसी हलचलें पैदा होती हैं। जीवनी शक्ति शरीर में जमी हुई विकृतियों को बाहर निकालने का प्रयास करती है। अंतरिक्ष शक्तियां हमारे शरीर, मन और अंत:करण का कायाकल्प करने का प्रयास करती हैं।

वैसे तो ईश्वर ने सारे दिन पवित्र बनाए हैं। शुभ कर्म करने के लिए हर घड़ी शुभ मुहूर्त है। फिर भी प्रकृति और ऋतु का सहयोग मिले तो और अच्छा है। इसलिए नवरात्रों के समय हम स्वयं साधना करें तो बहुत अच्छा है, क्योंकि इसमें ऋतु भी हमारी सहयोगी होती है। इस समय शरीर मौसम की मार से (अत्यधिक सर्दी या गर्मी) शिथिल नहीं होता। और अपनी आंतरिक शक्तियों को जगाने में प्रकृति हमारी सहायता करती है।

वैदिक साहित्य में नवरात्र की अवधि का विस्तृत वर्णन है। ऋषियों ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है इसका शाब्दिक अर्थ तो नौ रातें ही है, पर इनका गूढ़ार्थ कुछ और है। नौ रातें इस काया रूपी अयोध्या के नौ द्वार अर्थात हमारी नौ इंदियां हैं। जो मनुष्य इन नौ द्वारों- एक मुख, दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाएं, मूत्रेन्दिय और गुदा- के विषय में जागरूक रहता है, जो अपनी साधना और संयम से यह सुनिश्चित करता है कि इन नौ द्वारों से कोई शत्रु या विकार प्रवेश न कर पाए, वही अपने मनोरथ पूरे कर पाता है।

नवरात्र की साधना एक संकल्पित साधना है। जैसे कथा-पूजा या यज्ञ के समय हम कोई निश्चित जाप या पूजा करने या दान करने का संकल्प लेते हैं। उसी तरह इस अवधि के लिए भी हम स्वयं ही तय कर सकते हैं कि किस उद्देश्य के लिए, क्या हासिल करने के लिए संकल्प करना है। ऋषियों ने इस समय उपासना का निर्धारण कुछ ऐसा किया है कि वह कर पाना सभी के लिए सुलभ है। इसलिए नवरात्र के दिनों को वर्ष भर के जाने-अनजाने हुए भले- बुरे कृत्यों के प्रायश्चित के लिए तपस्या का भी समय मानना चाहिए।

इसीलिए कुछ लोग नवरात्र के समय गायत्री मंत्रों के जप का भी परामर्श देते हैं। कुछ लोगों के मन में संशय हो सकता है कि नवरात्र तो शक्ति या दुर्गा या राम की उपासना से जुड़े हैं, तब गायत्री का जाप क्यों? दुर्गा कहते हैं- दोष, दुर्गुणों को नष्ट करने वाली महाशक्ति को। नौ रूपों में मां दुर्गा की उपासना इसलिए की जाती है कि वह हमारी इन्दिय चेतना में बसे दुर्गुणों को नष्ट कर दे। हमारी पाप रूपी वृत्तियां ही महिषासुर हैं। नवरात्र में ऐसी प्रवृत्तियों पर मानसिक संकल्प द्वारा अंकुश लगाया और संयम द्वारा दमन किया जाता है। साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा- यह चार आत्मोत्कर्ष के चरण हैं। संयमशील आत्मा को दुर्गा या गायत्री की शक्ति से सम्पन्न कहा गया है। प्राण-चेतना के जगने पर यही शक्ति महिषासुर मदिर्नी बन जाती है। 
 
अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई

ॐ सांई राम।।।

 
Posted : 04/05/2022 4:02 am
Forum 1
(@surajboss)
Posts: 64
Trusted Member Admin
Topic starter
 

om sai ram !!!

श्री दुर्गा चालीसा   

नमो नमो दुर्गे सुख करनी । नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ।।

निराकार है ज्योति तुम्हारी । तिहूं लोक फैली उजियारी ।।

शशि ललाट मुख महा विशाला । नेत्र लाल भृकुटी विकराला ।।

रुप मातु को अधिक सुहावे । दरश करत जन अति सुख पावे ।।

तुम संसार शक्ति लय कीना । पालन हेतु अन्न धन दीना ।।

अन्नपूर्णा हुई जग पाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला ।।

प्रलयकाल सब नाशन हारी । तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ।।

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें । ब्रहृ विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ।।

रुप सरस्वती को तुम धारा । दे सुबुद्घि ऋषि मुनिन उबारा ।।

धरा रुप नरसिंह को अम्बा । प्रगट भई फाड़कर खम्बा ।।

रक्षा कर प्रहलाद बचायो । हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ।।

लक्ष्मी रुप धरो जग माही । श्री नारायण अंग समाही ।।

क्षीरसिन्धु में करत विलासा । दयासिन्धु दीजै मन आसा ।।

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित न जात बखानी ।।

मातंगी धूमावति माता । भुवनेश्वरि बगला सुखदाता ।।

श्री भैरव तारा जग तारिणि । छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ।।

केहरि वाहन सोह भवानी । लांगुर वीर चलत अगवानी ।।

कर में खप्पर खड्ग विराजे । जाको देख काल डर भाजे ।।

सोहे अस्त्र और तिरशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ।।

नगर कोटि में तुम्ही विराजत । तिहूं लोक में डंका बाजत ।।

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे । रक्तबीज शंखन संहारे ।।

महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी ।।

रुप कराल कालिका धारा । सेन सहित तुम तिहि संहारा ।।

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब । भई सहाय मातु तुम तब तब ।।

अमरपुरी अरु बासव लोका । तब महिमा सब रहें अशोका ।।

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें नर नारी ।।

प्रेम भक्ति से जो यश गावै । दुःख दारिद्र निकट नहिं आवे ।।

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई । जन्म-मरण ताको छुटि जाई ।।

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी । योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ।।

शंकर आचारज तप कीनो । काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ।।

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को । काहू काल नहिं सुमिरो तुमको ।।

शक्ति रुप को मरम न पायो । शक्ति गई तब मन पछतायो ।।

शरणागत हुई कीर्ति बखानी । जय जय जय जगदम्ब भवानी ।।

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा । दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ।।

मोको मातु कष्ट अति घेरो । तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ।।

आशा तृष्णा निपट सतवे । मोह मदादिक सब विनशावै ।।

शत्रु नाश कीजै महारानी । सुमिरों इकचित तुम्हें भवानी ।।

करौ कृपा हे मातु दयाला । ऋद्घि सिद्घि दे करहु निहाला ।।

जब लगि जियौं दया फल पाऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ।।

दुर्गा चालीसा जो नित गावै । सब सुख भोग परम पद पावै ।।

देवीदास शरण निज जानी । करहु कृपा जगदम्ब भवानी ।।

jai mata di.....

jai sai ram...

 
Posted : 04/05/2022 4:03 am
Share: